Last Updated on November 13, 2024 by Ankur Sood
Shimla. Himachal Pradesh Highcourtने बुधवार को मुख्य संसदीय सचिव (CPS) पद की संवैधानिकता पर फैसला सुनाते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट ने CPS एक्ट को रद्द कर दिया है, जिससे अब इन सचिवों को दी जा रही सभी सरकारी सुविधाएं बंद हो जाएंगी, और ये सभी विधायक की भूमिका में वापस आ जाएंगे।
क्या है मामला?
Himachal में CPS नियुक्तियों का मामला काफी समय से विवादों में रहा है। 2016 में “पीपल फॉर रिस्पॉन्सिबल गवर्नेंस” नामक संस्था ने हाईकोर्ट में इस मुद्दे पर याचिका दायर की थी, जिसके बाद अदालत में भाजपा नेताओं और अन्य विधायकों ने भी याचिका दायर की। याचिकाओं में मुख्य मुद्दा 2006 में बनाए गए उस कानून का था, जिसके आधार पर विभिन्न सरकारें अपने विधायकों को सीपीएस के रूप में नियुक्त करती रही हैं। इस नियुक्ति का विरोध संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत किया गया, जिसमें राज्य में मंत्रिमंडल की संख्या पर सीमा तय की गई है। सीपीएस नियुक्ति से इस संख्या का उल्लंघन होता है।
मौजूदा CPS और उनकी सुविधाएं
वर्तमान में, सुक्खू सरकार ने छह विधायकों को सीपीएस के पद पर नियुक्त किया था, जिन्हें प्रति माह लगभग 2.20 लाख रुपये वेतन और भत्ते मिलते हैं। इसके अलावा, गाड़ी की सुविधा भी प्रदान की जाती है। अब इस फैसले के बाद इन सभी सुविधाओं पर रोक लगाई जाएगी।
पहले भी हुआ है विवाद
हिमाचल में CPS पद को लेकर विवाद 2005 में शुरू हुआ था, जिसके बाद सरकार ने एक्ट पास करके इस पद के लिए नियम बनाए थे। लेकिन इस पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। इससे पहले भी कांग्रेस और भाजपा सरकारें सीपीएस नियुक्तियां करती रही हैं, परंतु दोनों ही पक्षों ने इस पद की संवैधानिकता पर सवाल उठाए हैं।
विपक्ष का रुख
भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया और इसे असंवैधानिक करार दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा हमेशा से इस पद के विरोध में थी और अब मांग है कि इस पद का लाभ लेने वाले विधायकों की सदस्यता भी समाप्त की जाए।
निष्कर्ष
हाईकोर्ट के इस फैसले से प्रदेश में राजनीतिक हलचल मच गई है, और यह देखना होगा कि सरकार इस फैसले के बाद क्या कदम उठाती है।



